श्री आमज माता के प्रांगण में एकात्म हिन्दू समाज !

अरावली की गोद में स्थित 1304 वर्ष प्राचीन शक्तिपीठ !

रिछेड़ (राजसमंद) की पावन धरा पर विराजमान श्री आमज माताजी का मंदिर आस्था, इतिहास और समरसता का अद्भुत संगम है। अरावली पर्वतमाला की रमणीय पहाड़ियों के मध्य स्थित यह शक्तिपीठ लगभग 1304 वर्ष पुराना माना जाता है और क्षेत्र के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

मेले की परंपरा –
प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल नवमी के अवसर पर रिछेड़ गांव में श्री आमज माताजी का विशाल मेला आयोजित होता है। इसी दिन मंदिर पर ध्वजा चढ़ाई जाती है। एक दिन पूर्व अष्ठमी को रात्रि जागरण होता है। इस तरह दो दिवसीय मेले में आसपास के लगभग 200 गांवों से श्रद्धालु एवं यात्री पहुंचते हैं। अनेक प्रकार की दुकाने व झूले लगाये जाते है। श्रद्धालू खरीददारी करते है।

सबके लिए भोजन प्रसादी-
तीर्थ स्थल पर आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज एक ही पंगत में बैठकर भोजन प्रसाद ग्रहण करता है, जो सामाजिक समरसता और एकात्मता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

मंदिर का गौरवशाली इतिहास :-
लोकमान्यताओं के अनुसार श्री आमज माताजी का आगमन ग्राम ऊनवा से हुआ था तथा वे रिछेड़ की पहाड़ी पर स्थित एक बाँस के पौधे से प्रकट हुई थीं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, रिछाजी नामक व्यक्ति अरावली पर्वतमाला की धामलमाल पहाड़ी में लकड़ियाँ लेने गए थे। जब वे बाँस काट रहे थे, तब माताजी ने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर पर्चा प्रदान किया। इसके पश्चात विक्रम संवत् 777 में मंदिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। उसी वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को मंदिर पर ध्वजा एवं कलश स्थापित कर विधिवत प्रतिष्ठा सम्पन्न की गई। कुछ गौत्र के परिवार माताजी को अपनी कुलदेवी मानते है।

अनूठी पूजा परंपरा :-
श्री आमज माताजी मंदिर में पूजा-अर्चना का दायित्व सेवक परिवारों द्वारा निभाया जाता है। ओसरा के क्रम में प्रत्येक परिवार का कार्यकाल एक वर्ष का होता है। मेले के दूसरे दिन पूजा-अर्चना का दायित्व एक परिवार से दूसरे परिवार को सौंपा जाता है।

मंदिर के मुख्य भोपा :- वर्तमान में श्री धुलीराम भील मन्दिर के भोपाजी हैं। परंपरा के अनुसार भोपा भील समाज से ही होते हैं तथा यह मान्यता है कि भोपा का चयन स्वयं माताजी की कृपा से होता है।

आमज माताजी सेवा मंडल ट्रस्ट की भूमिका :-
वर्तमान में मंदिर का संचालन आमज माताजी सेवा मंडल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। ट्रस्ट श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए न्यूनतम शुल्क पर भोजनशाला संचालित करता है तथा गौ-संवर्धन के उद्देश्य से गौशाला का संचालन भी कर रहा है। ट्रस्ट के अध्यक्ष सुरत सिंह जी दसाना की पुत्री ललिता सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “श्री आमज माता” का विमोचन श्री श्री 1008 अवधेशानन्द जी महाराज सुरजकुण्ड धाम द्वारा किया गया ।

प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आकर्षण :-
श्री आमज माताजी का मंदिर अपनी भव्यता और कलात्मकता के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर के अंदर काँच की सुंदर नक्काशी की गई है, जो पूरे परिसर को अत्यंत आकर्षक बनाती है। मंदिर तक पहुँचने के लिए मुख्य सड़क से लगभग 300 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर के समीप एक मनोहारी झरना और छोटा कुंड स्थित है, जहाँ वर्षभर स्वच्छ एवं पीने योग्य जल उपलब्ध रहता है। श्रद्धालु इस पवित्र जलधारा को “अमर गंगा” के नाम से जानते हैं।

अरावली की पावन पर्वतमालाओं के मध्य स्थित श्री आमज माताजी का यह प्राचीन शक्तिपीठ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि इतिहास, लोकपरंपरा, समरसता और प्रकृति की अनुपम छटा का भी अद्भुत संगम है। सदियों से यह शक्ति धाम श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और संस्कृति से जोड़ते हुए क्षेत्र की धार्मिक पहचान को गौरवान्वित कर रहा है।

श्री आमज माताजी की कृपा से हिन्दु समाज अपनी परंपरा संस्कृति एवं एकात्मकता को सुदृढ कर रहा है।

इस वर्ष यह मेला 22-23 जून को सम्पन्न हुआ। यह शक्तिपीठ राजसमंद जिला मुख्यालय से 50 किमी, उदयपुर जिला मुख्यालय से 110 किमी और पाली जिला मुख्यालय से 110 किमी है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *