भारत विकास परिषद के 64वें स्थापना दिवस पर विशेष- भाग- 1
लेखक – विक्रांत खंडेलवाल, क्षेत्रीय संगठन मंत्री
भारत विकास परिषद समाज के प्रबुद्ध, संपन्न एवं प्रभावी व्यक्तियों का एक गैर राजनीतिक, सामाजिक ,सांस्कृतिक ,राष्ट्रीय संगठन है । जो अपने सदस्यों के माध्यम से समाज के वंचित वर्ग की सेवा कर नवीन पीढ़ी में देशभक्ति के संस्कारों द्वारा समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के महान कार्य में विगत 6 दशकों से निरंतर सक्रिय है । परिषद का उद्देश्य है कि समाज के उच्च ,प्रबुद्ध एवं संपन्न वर्ग को सुसंगठित कर उनके हृदय में समाज के वंचित ,असमर्थ,एवं अशिक्षित वर्ग के प्रति संवेदनशीलता का भाव जागरण कर, उनके प्रति अपना मानवीय दायित्व समझकर नि:स्वार्थ सेवा हेतु तत्पर करना एवं भावी पीढ़ी को सुसंस्कारित करना । जिससे वो भविष्य में देश के श्रेष्ठ नागरिक बनकर समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में देश का सकारात्मक नेतृत्व करने में सक्षम और समर्थ बन सके ।

1962 में भारत चीन युद्ध के बाद सेना का मनोबल बढ़ाने और सहायता करने के उद्देश्य से दिल्ली में प्रारंभ हुई “सिटीजन काउंसिल” नामक संस्था को बाद में राष्ट्रीय आवश्यकताओं को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन पूजनीय सरसंघचालक श्री गुरूजी जी की प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद जन्म शताब्दी वर्ष में 12 जनवरी 1963 को “भारत विकास परिषद” का नाम दिया गया । प्रसिद्ध विचारक एवं सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बी पी सिंहा को प्रथम संरक्षक ,दिल्ली के पूर्व महापौर लाला हंसराज गुप्ता को प्रथम अध्यक्ष, सेवाभावी डॉक्टर सूरज प्रकाश जी को प्रथम महामंत्री बनाया गया । परिषद ने भारत माता को अपना आराध्य एवं स्वामी विवेकानंद को पथ प्रदर्शन के रूप में स्वीकार किया ।
भारतीय संस्कृति एवं भारतीय जीवन मूल्य परिषद के मूल मंत्र है भारत की राष्ट्रीय एकता, विश्वबंधुत्व, सर्वधर्म समभाव और उद्दात मानवता हमारी प्रेरणा एवं समाज के प्रति समरसता एवं एकात्मता का व्यवहार इसकी पूंजी है । राष्ट्रीय परिपेक्ष में प्रबल संवेदनशीलता, प्रखर राष्ट्रवाद एवं आध्यात्मिक चेतना संगठन की स्थाई पहचान है ।
भारत विकास परिषद की आस्था,मातृभूमि के प्रति समर्पण भाव और भारतीय जीवन मूल्य पर आधारित है । परिवार भाव के प्रति आस्था ,विचारों की स्वतंत्रता ,सर्वसम्मति, एकात्मता ,समरसता, सत्य, त्याग ,सेवा ,संस्कार एवं समर्पण आदि मूल्यों के प्रति अगाध श्रद्धा एवं अनुकरणीय आचरण ही संस्था के लिए मार्गदर्शन एवं दिशा निर्देश है । इन्हीं मूल्यों के संवर्धन के लिए संपर्क, सहयोग ,संस्कार ,सेवा एवं समर्पण ऐसे पांच ध्येयपूर्ण प्रेरक तत्वों को परिषद का कार्यपथ बनाया गया है ।
परिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ लक्ष्मीमल सिंघवी ने कहा कि “भारत विकास परिषद एक संस्था भी है,और एक आंदोलन भी है । यह भारतीय दृष्टि से अंकुरित, संपर्क से अभिसिंचित, सहयोग के हाथों से निर्मित, संस्कार के ह्रदय से स्पंदित और सेवा की अंजली में समर्पण का प्रसाद के रूप में है । “
भारत विकास परिषद ने छ: दशकों की विकास यात्रा में इस वर्ष देश भर में 10 क्षेत्रों, 80 प्रांतों, 1600 से अधिक शाखाओं तथा 83000 सदस्य परिवारों में पहुंची है । केंद्रीय, क्षेत्रीय ,प्रांत एवं शाखा स्तर के संगठनात्मक संरचना के माध्यम से अपने विभिन्न स्तर पर होने वाली बैठकों, कार्यक्रमों ,अभियानों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण हेतु देश भर में संस्कार एवं सेवा के कार्यों में गतिशील है ।
भारत विकास परिषद अपने संपर्क आयाम हेतु कार्य योजना के नाते परिषद के स्थापना दिवस 10 जुलाई को एक सार्वजानिक एवं जनसहभागिता वाले बड़े कार्यक्रम के रूप में मनाती है । अगस्त-सितम्बर माह में “संस्कृती सप्ताह” ,हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस आदि के साथ-साथ समय-समय पर विभिन्न विषयों पर वैचारिक गोष्ठियों का आयोजन भारत विकास परिषद द्वारा किया जाता है। ताकि समाज के विशिष्ट, प्रभावशाली लोगों को भारत विकास परिषद के उद्देश्यों एवं कार्यों से जोड़ा जा सके । इसके अतिरिक्त भी संपर्क वर्ष भर चलने वाली गतिविधि है । हम अपने विभिन्न कार्यक्रमों एवं सेवा प्रकल्पों में इस प्रकार के विशिष्ट लोगों को अतिथि के रूप में बुलाकर उनको संगठन से जोड़ने का प्रयत्न निरंतर करते रहते हैं ।
भारत विकास परिषद के द्वारा विशेष तौर पर अपने “संस्कार आयाम” के अंतर्गत भावी पीढ़ी को संस्कारित करने हेतु देशभर के विद्यालयों में 1967 से “राष्ट्रीय समूह गान प्रतियोगिता” का आयोजन प्रारंभ किया गया । जो बाद में देश भर में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ । इस आयाम के अंतर्गत कई कार्यक्रमों में भारत के कई राष्ट्रपति अतिथि के रूप में शामिल हो चुके हैं । 5 दशकों में निरंतर चलने वाले इस महत्वपूर्ण आयाम में प्रतिवर्ष विद्यालयों के हजारों विद्यार्थी भाग लेते हैं । वर्ष 2001-2 में भारत विकास परिषद के सर्वाधिक लोकप्रिय संस्कार के कार्यक्रम “भारत को जानो प्रतियोगिता” एवं “गुरु वंदन – छात्र अभिनंदन” को राष्ट्रीय प्रकल्प के रूप में स्वीकार किया गया । जिसके अंतर्गत होने वाली सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता में आज देश के हजारों विद्यालयों में लाखों विद्यार्थियों द्वारा भाग लिया जाता है । गत वर्ष इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छात्रों की संख्या 16 लाख से अधिक थी । गत वर्षो में इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता का आयोजन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन माध्यमों से भी किया जाने लगा है । उपरोक्त तीनों कार्यक्रमों के अतिरिक्त बाल संस्कार शिविर, युवा संस्कार शिविर और परिवार प्रबोधन शिविर के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों में भारत विकास परिषद द्वारा परिवार प्रबोधन आदि के कार्यक्रम भी समय समय पर किए जाते हैं ।
क्रमश….