अभागा थारपारकर

इस समय भारत की सीमा से सटा (कच्छ, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर जिले की सीमाओं को स्पर्श करने वाला), पाकिस्तान का ‘थारपारकर’ जिला, ‘दियारी’ (दिवाली) मना रहा हैं। आज भी वहां की 48% जनसंख्या हिंदू हैं। किंतु यह दियारी उत्सव खुलेपन से मनाने की स्थिति वह नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं पर आक्रमण बढ़े हैं। हिंदू लड़कियों को उठाकर ले जाना, उन्हें बलात् मुस्लिम धर्म में धर्मांतरित कर उनसे विवाह करना, बाद में उन्हें छोड़ देना यह आम बात हैं। हालांकि पाकिस्तान में थारपारकर जिले को सबसे ज्यादा सांप्रदायिक सौहार्द्र वाला जिला माना जाता हैं। किंतु जमिनी हकीकत कुछ और हैं।

थारपारकर पहले ऐसा नहीं था। 1947 में विभाजन के समय, थारपारकर में हिंदू जनसंख्या का अच्छा खासा प्रतिशत था। यह सारे सिंधी भाषिक थे। गरीबी अत्यधिक थी। भाग कर हिंदुस्तान में जाने के लिए भी पैसे नहीं थे। इसलिए, इनमें से अधिकतर वहीं रुक गए। विभाजन के बाद भी कुछ समय तक, इनका राजस्थान और गुजरात से अच्छा खासा संबंध और संपर्क बना रहा। किंतु बाद में हिंदू मंदिरों पर हमले बढ़ने लगे। कोयला खदान और अन्य परियोजनाओं के कारण, पाकिस्तान के अन्य क्षेत्रों से मुस्लिम यहां आकर बसने लगे। धीरे-धीरे जनसंख्या असंतुलन निर्माण होता गया। हिंदू दिनों दिन असुरक्षित होते गए।

विभाजन के समय थारपारकर के साथ धोखा हुआ। उन दिनों असम यह हिंदू बहुल (कांग्रेस शासित) प्रदेश था। उसमें सिलहट यह मुस्लिम बहुसंख्य (60% मुस्लिम) जिला था। इसी आधार पर, जवाहरलाल नेहरू ने सिलहट में जनमत संग्रह की बात मान ली। 6 जुलाई 1947 को जनमत संग्रह हुआ। 56% लोगों ने पाकिस्तान के पक्ष में मतदान किया, और 14 अगस्त 1947 को, सिलहट पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) का हिस्सा बन गया।

इस न्याय से थारपारकर में भी जनमत संग्रह कराना चाहिए था। यह सिंध प्रांत का हिस्सा था। सिंध में मुस्लिम लीग की सरकार थी। अतः सिंध का पाकिस्तान में जाना तय था। इस सिंध में, थारपारकर जिले में, हिंदुओं की जनसंख्या 70% से भी ज्यादा थी। किंतु हम सब का, थारपारकर के हिंदुओं का, और अपने देश का दुर्भाग्य रहा, की थारपारकर में जनमत संग्रह की कोई बात नेहरू जी ने नहीं रखी। इसलिए, हिंदू बहुल होते हुए भी थारपारकर, 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।

इस थारपारकर के दुर्भागी हिंदुओं के जीवन में एक और अवसर अवसर आया था, भारत में शामिल होने का…

1971 के दिसंबर में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध 3 दिसंबर से 16 दिसंबर तक, कुल 13 दिन चला।

इस युद्ध में भारतीय सेना की 10 पैरा कमांडो बटालियन ने 5 दिसंबर को, थारपारकर जिले के छाछरो (Chachro) में गोरिल्ला हमला करने की योजना पर काम प्रारंभ किया। यहां पाकिस्तान रेंजर्स के विंग का मुख्यालय था। इस मुख्यालय को ध्वस्त किया गया।

यह छापे बड़े जबरदस्त थे। सारी रात भारतीय सेना ने, दुश्मन के इलाके में चलकर, उनके ठिकानों को नष्ट किया। यह पूरा रेतीला क्षेत्र था। इसमें सेना ने तेज गतिशीलता दिखाई। हल्के हथियारों का और LMG माउंटेड वाहनों का उपयोग किया। लक्ष्य पर ‘हिट एंड एक्सफिल’ किया। इस पूरे अभियान में, भारतीय सेना से कोई भी हताहत नहीं हुआ। किंतु अनेक पाकिस्तानी सैनिक और सैन्य अधिकारी मारे गए।

सोमवार, 8 दिसंबर को भारतीय सेना ने वीरवाह और नगरपारकर पर कब्जा कर लिया। जिस दिन युद्ध विराम हुआ उसी दिन, अर्थात 16 दिसंबर को, भारतीय सेना का कब्जा इस्लामकोट तहसील पर भी हो गया था। इसी के साथ, युद्ध विराम के समय, भारतीय सेना ने पाकिस्तान का लगभग 13,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र, अपने नियंत्रण में ले लिया था।

थारपारकर की इस महत्वपूर्ण जीत के लिए इस अभियान का नेतृत्व करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह को ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया, तो 10 पैरा बटालियन को ‘Battle Honour ‘Chachro 1971’ मिला।

अपने नियंत्रण में आने के बाद, इस क्षेत्र में, भारतीय सरकार ने नागरी प्रशासन व्यवस्था प्रारंभ की। अधिकारी नियुक्त हुए। मेजर जनरल आर डी हिम्मतसिंह जी (General Officer Commanding, 11 Infantry Division) उन दिनों भुज – नालियां – खावड़ा सेक्टर के प्रमुख थे। उन्हीके अधीन थारपारकर का नियंत्रण दिया गया। लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह, प्रारंभिक दिनों में कमांडिंग अधिकारी थे।

20 राजपूत इन्फेंट्री बटालियन, नगरपारकर और विरावाह क्षेत्र में प्रशासनिक नियंत्रण की मुख्य इकाई बनी। गुजरात फ्रंटियर्स स्काउट्स और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के कुछ अधिकारी कानून व्यवस्था, डाक, स्वास्थ्य, खाद्यान्न वितरण आदी कार्य देख रहे थे।

कर्नल एस सी भंडारी, प्रशासनिक दृष्टि से स्थानीय प्रमुख अधिकारी थे। इन्होंने वहां डाकघर खोले। इनके अतिरिक्त, कैप्टन के आर पटेल, लेफ्टिनेंट कर्नल एन बी कपूर आदि अधिकारी, लॉजिस्टिक्स और राशन वितरण से लेकर सभी व्यवस्थाएं देख रहे थे। भारतीय डाक विभाग ने छाछरो, नगरपारकर और मिठी में अस्थाई पोस्ट ऑफिस खोलें। भारतीय रुपये और भारतीय डाक टिकट, चलन मे आने लगे। स्थानीय हिंदू नेता, मिठी के ठाकुर जगदीश सिंह और छाछरो से लालजी महराज को, सेना की सलाहकार समिति में जोड़ा गया।

इस क्षेत्र का पहला पोस्ट ऑफिस 11 जनवरी 1972 को खुला। भारत सरकार ने इस क्षेत्र को पिन कोड भी दिया। इस क्षेत्र का PIN था – 344503 (वर्तमान मे यह पिन कोड, राजस्थान के बाडमेर जिले के सिवान को दिया गया हैं)।

कुल मिलाकर, वर्ष 1972 यह थारपारकर के लोगों के लिए बड़ा सुकून भरा, आश्वासक और विशेष था। इस वर्ष, शुक्रवार 29 सितंबर से रविवार 8 अक्टूबर तक, इस पूरे क्षेत्र में नवरात्रि बड़े धूमधाम से मनाई गई। 6 अक्टूबर की अष्टमी पूजा बड़ी विशेष रही। थारपारकर के हिंदुओं में गजब का उत्साह और आनंद था। वर्ष 1972 की दियारी (दिवाली), शुक्रवार 20 अक्टूबर को थी। शायद थारपारकर के हिंदुओं के लिए यह दिवाली सबसे अच्छी (और शायद स्वतंत्र भारत की अंतिम) रही..!

किंतु इसी बीच 2 जुलाई 1972 को शिमला में इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच समझौता हुआ। पाकिस्तान के 93,000 सैनिक हमारे कब्जे में थे। थारपारकर क्षेत्र का 13,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र हमारे नियंत्रण में था। तुरुप के सारे पत्ते हमारे पास थे।

किंतु इस बार भी हमारे थारपारकर के हिंदू, दुर्भागी ही रहे…

मजेदार बात यह थी, कि पाकिस्तान में, भारतीय सेना के थारपारकर क्षेत्र के नियंत्रण को लेकर कोई विशेष असंतोष या विरोध नहीं था। बांग्लादेश जाने से वह तो पहले से ही पराभूत मानसिकता में थे। पाकिस्तानी नागरिक यह मान कर चल रहे थे, कि हिंदू बहुल थारपारकर क्षेत्र से भारत अपना नियंत्रण कभी नहीं हटाएगा।

किंतु अपनी भलमानसता दिखाने के लिए, नेहरू जी की बेटी इंदिरा गांधी ने, पुनः थारपारकर के सिंधी भाषिक, हिंदू भाई-बहनों के साथ छल किया। उनको धोखा दिया..!

पाकिस्तान पर विजय के ठीक 1 वर्ष और 6 दिन के बाद, अर्थात 22 दिसंबर 1972 को, भारत ने थारपारकर क्षेत्र को पुन: पाकिस्तान को लौटा दिया..!

उन दिनों की स्थिति, पाकिस्तानी जनमानस की भावनाएं, इन सबको देखते हुए लगता हैं कि भारत, थारपारकर को अपने पास सहज रुप से रख सकता था। किंतु रखा नहीं।

इस एक वर्ष के नियंत्रण का परिणाम यह हुआ कि शिमला समझौते के बाद, थारपारकर के अनेक हिंदू समझ गए कि शायद हमें फिर से पाकिस्तान में लौटना होगा। इसलिए जिन हिंदुओं के पास पैसे थे, वह भारत के अन्य भागों में चले गए। इसके कारण हिंदू जनसंख्या कम हो गई।

आज थारपारकर क्षेत्र में फिर भी 48% हिंदू हैं। यह क्षेत्र पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित और अविकसित क्षेत्र हैं। यहां भरपूर खनिज संपत्ती मिली हैं। कोयले की अनेक खदानें, कुछ वर्षों से से चल रही हैं। चीन की शंघाई इलेक्ट्रिकल ने 1,320 मेगावाट की परियोजना और 7.8 मिलियन टन प्रतिवर्ष कोयला खनन का ठेका लिया हैं। चाइना मशीनरी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (CMEC) ने भी इसी प्रकार की परियोजना लगाई हैं।

इस समय थारपारकर के हिंदुओं की स्थिति ठीक नहीं हैं। जवान हिंदू लड़कियों को उठाकर ले जाना आम बात हैं। अधिकतर प्रकरण पुलिस के पास नहीं जाते। मंदिरों पर भी हमले हो रहे हैं…

थारपारकर के हिंदुओं के जीवन में दो अवसर आए थे, इन सब से बच निकलने के। किंतु दुर्भाग्य, जवाहरलाल जी, और बाद में उनकी बेटी इंदिरा जी के कारण, वह भी हाथ से जाते रहे..

आज थारपारकर का हिंदू वास्तव में अभागा हैं..!
(आगामी प्रकाशित होने वाले, ‘इंडिया से भारत – एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश)

  • प्रशांत पोळ

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *