हल्दीघाटी विजय ने संदेश दिया कि कोई भी विदेशी आक्रमण भारत को झुका नहीं सकता: डॉ भागवत

हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने पर उदयपुर में राष्ट्र चेतना का विराट संगम

उदयपुर, 17 जून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत का इतिहास पराधीनता का नहीं, बल्कि विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध निरंतर चले संघर्ष, प्रतिरोध और आत्मगौरव का इतिहास है। हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं था, बल्कि राष्ट्रचेतना और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संपूर्ण समाज द्वारा लड़ा गया महासंग्राम था।

हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती के अवसर पर उदयपुर के गांधी ग्राउंड में प्रताप गौरव केन्द्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ के तत्वावधान में आयोजित विशाल ‘राष्ट्र चेतना संकल्प सभा’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी की विजय इसलिए हुई क्योंकि महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उन्होंने कहा कि युद्ध के उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों, समकालीन स्रोतों और स्वयं मुगल इतिहासकारों के वर्णनों से स्पष्ट होता है कि युद्ध के विभिन्न चरणों में मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा। उन्होंने कहा कि यदि युद्ध के बाद भी शत्रु भय और असुरक्षा की स्थिति में रहा, तो वास्तविक विजय किसकी थी, इसका निर्णय इतिहास स्वयं करता है।

उन्होंने युद्ध के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा चेतक के अद्भुत पराक्रम, प्रताप की युद्धनीति और सैनिकों के आत्मबल ने सीमित संसाधनों के बावजूद विशाल साम्राज्य की सैन्य शक्ति को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप की सेना में राजवंश व योद्धा वर्ग के साथ सम्पूर्ण समाज खड़ा था। जाति, पंथ, क्षेत्र और सामाजिक भेदों से ऊपर उठकर समाज राष्ट्ररक्षा के लिए एकजुट हुआ था।

सरसंघचालक ने कहा कि भारत का समाज कभी भी स्वेच्छा से पराधीनता स्वीकार करने वाला समाज नहीं रहा। जब-जब विदेशी आक्रांताओं ने इस भूमि पर अधिकार करने का प्रयास किया, तब-तब प्रतिरोध की अग्नि प्रज्ज्वलित हुई। उन्होंने बप्पा रावल, ललितादित्य, महाराणा प्रताप और अन्य वीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की आत्मा को पराजित करना किसी भी आक्रांता के लिए संभव नहीं हो सका।

उन्होंने कहा कि नरेटिव गढ़ने वाले इतिहासकारों ने तथ्यों के विपरीत विमर्श चलाया। जबकि मुगल इतिहासकार स्वयं स्वीकार करते है कि पहले हमले में ही उन्हें 6-7 मील पीछे हटना पड़ा। महाराणा ने हमला किया तो चेतक के पांव मुगल सेनापति के हाथी पर थे। युद्ध से लौट रही मुगल सेना पर मेवाड़ियों ने मिट्टी के ढ़ेले फेंके। मुगल गोगुंदा के चारो तरफ दीवार बनाकर बंद हो गये। घोड़े का मांस खाकर जीवित रहे, पर बाहर निकलने का साहस नहीं कर पाये। फिर विजय कौन हुआ? हल्दीघाटी के युद्ध के संदर्भ में भी तथ्यों की पुनर्समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिन महाराणा प्रताप की जयंती आज पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जा रही है, वही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि राष्ट्र अपने वास्तविक नायकों को कभी नहीं भूलता।

डॉ. भागवत ने कहा, “दुनिया में कहीं अकबर की जयंती नहीं मनाई जाती, जबकि महाराणा प्रताप का स्मरण आज भी जन-जन करता है। इतिहास का यह लोकनिर्णय स्वयं बताता है कि विजय किसकी हुई थी।”

उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप ञको ‘हिंदुआ सूरज’ यूं ही नहीं कहा गया। उन्होंने अपने धर्म, संस्कृति, स्वाभिमान और राष्ट्रहित के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उनका जीवन सत्ता प्राप्ति का नहीं, बल्कि लोककल्याण, आदर्श शासन और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा का उदाहरण है। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा आदर्श स्थापित किया जो आज भी राष्ट्रजीवन को प्रेरणा देता है।

सरसंघचालक ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी एकता, समरसता और आत्मविश्वास में निहित है। केवल संकट के समय ही नहीं, बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी समाज को संगठित और जागृत रहना होगा। उन्होंने कहा कि स्वाभिमान और ‘स्व’ का भाव जब तक जीवित रहेगा, तब तक भारत हर चुनौती का सामना करते हुए विजय की नई गाथाएं रचता रहेगा।

उन्होंने उपस्थित जनसमूह का आह्वान करते हुए कहा कि सभी नागरिक महाराणा प्रताप के जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्रोत्थान, समाज संगठन और विश्वकल्याण का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि भारत का उत्थान ही विश्व के कल्याण का मार्ग है और इसी दिशा में कार्य करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

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हल्दीघाटी विजय का गौरव इतिहास की भ्रांतियों का करेगा अंत : श्रीजी श्याम शरण

—समारोह में विशिष्ट अतिथि निम्बार्काचार्य श्रीजी श्याम शरण देवाचार्य ने कहा कि यह आयोजन केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का महापर्व है। उन्होंने कहा कि वर्षों से इतिहास के संबंध में फैलाई गई भ्रांतियों का निराकरण अब समाज के सामने हो रहा है और महाराणा प्रताप के वास्तविक गौरव को पुनः स्थापित किया जा रहा है।

अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि मेवाड़ की भूमि शौर्य और भक्ति दोनों की पावन धरा है। एक ओर इस भूमि ने वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रनायक को जन्म दिया, वहीं दूसरी ओर भक्तिमती मीराबाई जैसी महान कृष्णभक्त को भी दुनिया को दिया। उन्होंने कहा कि जब मातृभूमि और सनातन संस्कृति पर संकट आया, तब महाराणा प्रताप ने भगवान श्रीराम के “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” के आदर्श को आत्मसात करते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।

श्रीजी श्याम शरण ने कहा कि राष्ट्रभक्ति की यही चेतना समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होती रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” की भावना के साथ मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित है। उन्होंने समाज से जाति, वर्ग और संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश देती है। समारोह में राष्ट्रभक्ति का वातावरण तब और प्रखर हो गया जब उपस्थित जनसमूह ने “चंदन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है, हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है” गीत का सामूहिक गायन किया।

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हल्दीघाटी विजय का सत्य जन-जन तक पहुंचाना होगा: डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा

—समारोह की अध्यक्षता करते हुए वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि अब समय आ गया है कि हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक इतिहास को जन-जन तक पहुंचाया जाए और उन भ्रांतियों का निराकरण किया जाए जो वर्षों से समाज में प्रचारित की जाती रही हैं।

डॉ. शर्मा ने कहा कि इस वर्ष महाराणा प्रताप जयंती और हल्दीघाटी युद्ध के 450 वर्ष पूर्ण होने का दुर्लभ संयोग बना है, जिससे इस आयोजन का महत्व और बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को परास्त कर स्वाधीनता, स्वाभिमान और राष्ट्रधर्म की रक्षा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया था।

उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच संघर्ष नहीं था, बल्कि विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध भारतीय अस्मिता की रक्षा का महान अभियान था। मेवाड़ ने कभी भी विदेशी सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया और अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखा।

डॉ. शर्मा ने समाज के सभी वर्गों से आह्वान किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर हल्दीघाटी विजय के ऐतिहासिक सत्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत तथा संत सान्निध्य में पधारे निम्बार्क पीठाधीश्वर के आशीर्वाद से यह संदेश देश ही नहीं, बल्कि विश्वभर में बसे भारतीय समाज तक पहुंचेगा।

उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में प्रशासन, मीडिया, सामाजिक संगठनों एवं हजारों कार्यकर्ताओं के योगदान की सराहना करते हुए इसे राष्ट्रचेतना के नवजागरण का ऐतिहासिक अभियान बताया।

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गूंजते रहे जयकारे –

हजारों आंगतुकों की उपस्थिति में सभा के दौरान “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम्”, “जय श्रीराम” और “महाराणा प्रताप अमर रहें” के उद्घोषों से पूरा गांधी ग्राउंड राष्ट्रभक्ति के स्वर से गुंजायमान रहा। सम्पूर्ण मेवाड़ वागड़ व राजस्थान के अन्य जिलों सहित देश के कोने—कोने से उपस्थिति रही। बड़ी संख्या में संत समाज का भी आशीर्वाद मिला। राष्ट्र चेतना संकल्प सभा राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव का विराट उद्घोष बन गई। समारोह का सीधा प्रसारण किया गया। इसे एक लाख से अधिक लोगों ने विभिन्न प्लेटफॉर्म पर देखा।

आरंभ में प्रताप गौरव केन्द्र के निदेशक अनुराग सक्सेना ने सभी का स्वागत करते हुए वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति व समिति के अंतर्गत संचालित प्रताप गौरव केन्द्र का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. मोहन भागवत के सरकार्यवाह रहते हुए शिलान्यास हुआ और सरसंघचालक का दायित्व संभालने के बाद 2016 में केन्द्र का उद्घाटन हुआ। उन्होंने कहा कि प्रताप गौरव केंद्र में श्रव्य दृश्य प्रदर्शनी से महाराणा प्रताप के हल्दीघाटी युद्ध में हार होने के विमर्श को तोड़ा गया है और महाराणा प्रताप के हल्दीघाटी युद्ध में विजय होने के विमर्श को स्थापित किया गया है। उन्होंने युवा पीढ़ी से हल्दीघाटी विजय का उद्घोष पूरे विश्व में गुंजाने का प्रण लेने का आह्वान किया। उन्होंने हल्दीघाटी विजय सार्द्ध चतु: शती समारोह के तहत वर्ष भर हुए आयोजनों की जानकारी भी दी।

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सीएम सहित कई विशिष्टजन रहे सभा में

राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में मेवाड़-वागड़ के कई संत-महंत, प्रबुद्धजन एवं जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

विशेष रूप से मेवाड़ राजपरिवार के महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़, महिमा कुमारी मेवाड़ व निवृत्ति कुमारी मेवाड़ भी उपस्थित रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख अरुण जैन, राजस्थान क्षेत्र संघचालक डॉ. रमेशचंद्र अग्रवाल, प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संगठन मंत्री जे नंदकुमार, लघु उद्योग भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री प्रकाश चंद्र, भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री गजेन्द्र सिंह भी उपस्थित थे।

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