किसी राष्ट्र के इतिहास में कुछ घटनाएँ केवल युद्ध नहीं होतीं, वे किसी समाज की चेतना, स्वाभिमान और आत्मबोध की आधारशिला बन जाती हैं। 18 जून 1576 को लड़ा गया हल्दीघाटी का युद्ध ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना है। यह युद्ध केवल मेवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि स्वतंत्र अस्तित्व और साम्राज्यवादी अधीनता के बीच टकराव का प्रतीक था। दुर्भाग्यवश औपनिवेशिक काल में निर्मित अनेक ऐतिहासिक व्याख्याओं ने भारतीय इतिहास के अनेक अध्यायों की तरह हल्दीघाटी के युद्ध को भी ऐसे दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीय पक्ष के आत्मसम्मान, संघर्ष और उपलब्धियों को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। आज आवश्यकता है कि उपलब्ध समकालीन स्रोतों, अभिलेखों, प्रशस्तियों और इतिहासकारों के मतों के आधार पर इस युद्ध का पुनर्पाठ किया जाए।
महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए समर्पित रहा। अकबर द्वारा एक के बाद एक भेजे गए 4 संधि प्रस्तावों के बावजूद प्रताप ने मेवाड़ की स्वतंत्र सत्ता से समझौता स्वीकार नहीं किया। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रताप की ओर से कभी भी मुगल दरबार में संधि करने का प्रस्ताव नहीं भेजा गया। यह उस संघर्ष के मूल चरित्र को स्पष्ट करता है जिसमें एक ओर विस्तारवादी साम्राज्य था और दूसरी ओर अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के लिए संकल्पित मेवाड़।
हल्दीघाटी युद्ध के संदर्भ में महाराणा प्रताप के चरित्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व की घटना में दिखाई देता है। जब यह सूचना मिली कि मानसिंह सीमित सैनिकों के साथ शिकार के लिए निकला है, तब कुछ सामंतों ने उस पर अचानक आक्रमण करने का सुझाव दिया। किंतु प्रताप ने इसे अस्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा कि शत्रु से सामना रणभूमि में होगा, छलपूर्वक नहीं। भारतीय युद्ध परंपरा में नैतिक मूल्यों और मर्यादा का जो स्थान रहा है, यह घटना उसका सशक्त उदाहरण है।
युद्ध के घटनाक्रम का विवरण समकालीन इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी ने प्रस्तुत किया है, जो स्वयं इस युद्ध के समय मुगल पक्ष के साथ उपस्थित था। उसके अनुसार महाराणा प्रताप ने अपनी सेना को दो भागों में विभाजित कर आक्रमण किया। हकीम खान सूर के नेतृत्व में मेवाड़ी हरावल ने शाही सेना के अग्रभाग पर ऐसा प्रहार किया कि वह बिखर गया। दूसरी ओर स्वयं प्रताप ने काजी खान के मोर्चे पर आक्रमण करते हुए मध्य भाग तक धावा बोल दिया। बदायूंनी लिखता है कि इस आक्रमण के कारण अनेक मुगल अधिकारी और सैनिक मैदान छोड़कर पीछे हटने लगे। काजी खान भी घायल होकर युद्धक्षेत्र से हट गया।
इस घटनाक्रम की पुष्टि अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल भी करता है। उसके अनुसार प्रताप के प्रथम आक्रमण के बाद शाही सेना बनास नदी पार कर पाँच-छह कोस तक पीछे हट गई। स्थिति इतनी गंभीर थी कि सेना का मनोबल टूट गया। इसी समय मिहत्तर खान ने ढोल बजाकर सेना को संगठित करने का प्रयास किया, जिसके बाद सैनिकों में बादशाह का भय और आशा का संचार हुआ। अबुल फजल संकेत देता है कि युद्ध के प्रारम्भिक और प्रत्यक्ष प्रभावों में महाराणा प्रताप का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा था। वह ग्वालियर के राजा रामशाह तंवर और मेवाड़ के योद्धाओं की वीरता का भी उल्लेख करता है तथा स्वीकार करता है कि उनके शौर्य का वर्णन करना लेखनी की शक्ति से बाहर है।
हल्दीघाटी युद्ध के परिणाम का मूल्यांकन केवल रणभूमि तक सीमित नहीं होना चाहिए। किसी भी युद्ध का वास्तविक आकलन उसके बाद की परिस्थितियों से भी होता है। यदि किसी पक्ष ने निर्णायक विजय प्राप्त की हो तो वह विजेता के आत्मविश्वास और पराजित पक्ष की स्थिति में स्पष्ट दिखाई देती है। किंतु उपलब्ध विवरण इसके विपरीत संकेत करते हैं। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि समकालीन मुस्लिम इतिहासकारों के वर्णनों से भी शाही सेना की दुर्दशा स्पष्ट होती है। उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे प्रताप का पीछा कर सकें। उन्हें लगातार इस बात का भय बना रहा कि कहीं प्रताप और उनकी सेना घात लगाकर पुनः आक्रमण न कर दें। इसी आशंका के कारण गोगुंदा पहुँचने पर शाही सेना ने अपने शिविर के चारों ओर खाइयाँ खुदवाकर सुरक्षा प्रबंध किए। वे लिखते है कि “शाही सेना गोगुन्दे में कैदी की भांति सीमाबद्ध ही रही और अन्न तक न ला सकी, जिससे उसकी और भी दुर्दशा हुई। इन सब बातों पर विचार करते हुए यही मानना पड़ता है कि इस युद्ध में प्रतापसिंह की ही प्रबलता रही थी।”
अब्दुल कादिर बदायूंनी भी उल्लेख करता है कि उस समय स्थानीय जनमानस मुगलों की विजय की चर्चा नहीं कर रहा था। इसके विपरीत लोग लौटती हुई सेना का उपहास कर रहे थे। यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि तत्कालीन समाज में युद्ध की धारणा मुगल विजय के रूप में स्थापित नहीं थी।
समकालीन ताम्रपत्र और प्रशस्तियाँ भी इस विमर्श को नया आयाम प्रदान करती हैं। 1577 ईस्वी के ताम्रपत्र में पुरोहित राम के वंशजों को ओड़ा गांव और 1583 ईस्वी के ताम्रपत्र में हल्दीघाटी के वीर कान्हा सांधू के उत्तराधिकारियों को मृगेश्वर गांव दान देने का उल्लेख है। इन तामपत्रों से प्रताप की सक्रिय और स्वतंत्र सत्ता का प्रमाण मिलता है। रणछोड़ राय मंदिर प्रशस्ति, सुरखण्ड का खेड़ा सराडा में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि महाराणा प्रताप ने अकबर की सेना को पराजित किया और विजय के उपलक्ष्य में दान प्रदान किया। जगन्नाथ राय मंदिर प्रशस्ति जगदीश मन्दिर उदयपुर में मानसिंह की सेना के पीछे हटने का वर्णन मिलता है। सीसारमा स्थित वैद्यनाथ मंदिर प्रशस्ति में प्रताप को धर्म और क्षत्रिय गौरव के रक्षक के रूप में स्मरण किया गया है। महाकवि सदाशिव द्वारा वर्णित श्लोक में प्रताप को युद्ध में विजयी होकर लौटने वाला शासक बताया गया है।
इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने भी हल्दीघाटी के युद्ध को राजस्थान की “थर्मोपल्ली” की संज्ञा देते हुए इसे वीरता और आत्मबलिदान का अमर प्रतीक बताया। उनके अनुसार यह दिन आर्य जाति के गौरव का दिन था और वीरता व महानता के सम्मान किये जाने तक हल्दीघाटी का नाम इतिहास में प्रकाशमान रहेगा।
समकालीन फारसी इतिहासकारों के विवरण, युद्धोपरांत शाही सेना की स्थिति, ताम्रपत्रों और प्रशस्तियों में संरक्षित स्मृतियाँ तथा अनेक इतिहासकारों के मत इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि युद्ध में महाराणा प्रताप का पलड़ा भारी था। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रताप अपने मूल उद्देश्य मेवाड़ की स्वतंत्र अस्मिता और स्वाभिमान की रक्षा में अडिग रहे। उन्होंने न तो अधीनता स्वीकार की और न ही संघर्ष का मार्ग छोड़ा।
मेवाड़ इस महाराणा प्रताप जयंती एवं हल्दीघाटी युद्ध विजय के 450 वर्ष के अवसर पर इतिहास से न्याय की अपेक्षा रखता है और हल्दीघाटी के युद्ध के निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन की प्रतीक्षा करता है। यह केवल अतीत का प्रश्न नहीं, बल्कि नई पीढ़ी में आत्मबोध, स्वाभिमान और अपने ऐतिहासिक नायकों के प्रति सम्मान जागृत करने का विषय भी है।
संदर्भ
- मुंतखाब उल तवारिक,अब्दुल कादिर बदायूनी I
- आईने अकबरी,अबुल फजल I
- चैत्र कृष्ण तृतीया,विक्रम संवत 1634 का ताम्रपत्र I
- फाल्गुन शुक्ल पंचमी विक्रम संवत 1639 का ताम्रपत्र I
- जेठ शुक्लाएकादशी विक्रम संवत 1642 ,रणछोड़ राय मंदिर प्रशस्ति I
- वैशाख पूर्णिमा,विक्रम संवत 1708,जगन्नाथ राय मंदिर प्रशस्ति I
- माघ सुदी द्वादशी,विक्रम संवत 1772 ,वैद्यनाथ मंदिर प्रशस्ति I
डॉ सुदर्शन सिंह राठौड-आचार्य, इतिहास विभाग राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय उदयपुर 9660090556