मामाजी की आशा :
“मनख और बैयरा, सीता माता और राम को पथ पालजो”
मामा बालेश्वर दयाल जी की पुण्यतिथि पर वागड़ क्षेत्र में हो रहे विभिन्न आयोजन
मामाजी — श्री बालेश्वर दयाल — की समूची साधना और सामाजिक यात्रा का मूल संदेश इसी लोकपंक्ति में समाया हुआ है। “मनख और बैयरा, सीता माता और राम को पथ पालजो” केवल एक कथन नहीं, बल्कि जनजाति समाज के लिए जीवन-दर्शन है। इसका आशय है कि मनुष्य और प्रकृति, दोनों अपने आचरण में मर्यादा, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलें—जैसा सीता और राम ने जीवन में किया।
मामाजी का विश्वास था कि जनजाति समाज की जागृति केवल राजनीतिक संघर्ष से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना से संभव है। इसी कारण उन्होंने रामकथा को भिली/वागड़ी लोकभाषा में प्रस्तुत किया और 36 पृष्ठों की रामायण के माध्यम से राम-सीता के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया। उनके लिए राम किसी राजसिंहासन के प्रतीक नहीं, बल्कि सत्य, संयम और लोकमंगल के मार्गदर्शक थे।
जल, जंगल, ज़मीन, जन व जानवर के सामूहिक अस्तित्व को मामाजी ने रामनीति का ही विस्तार माना। शोषण के विरोध, शराब मुक्ति और अंधविश्वास मुक्ति के उनके प्रयास इसी सोच से प्रेरित थे कि समाज और प्रकृति दोनों धर्मपथ पर चलें।
बामनिया का राम मंदिर इस विचारधारा का जीवंत केंद्र बना, जहाँ आज भी लोग उनके आदर्शों को स्मरण कर आत्मशुद्धि और सामाजिक एकता का संकल्प लेते हैं।
राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में फैली जनजागृति इस बात का प्रमाण है कि मामाजी का संदेश समय की सीमाओं से परे है। उनकी आशा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है—कि मनुष्य भी और प्रकृति भी, दोनों राम-सीता के पथ पर चलें, तभी समाज में न्याय, संतुलन और शांति स्थापित हो सकती है।
ऐसे महापुरुष को शत-शत नमन।
